अनंत चतुर्दशी पर रखे विष्णु भगवान् का व्रत। धन धान्य में होगी भारी बढ़ोतरी। 


 

अनंत चतुर्दशी कथा, व्रत विधि। 


 

सुमंत (Sumant) नाम का ब्राहमण उसकी वधु दीक्षा (Diksha) की मृत्यु के उपरांत सुमंत कर्कश (Karkarsh )से एक दूसरा विवहा रचते है जो की सुमंत की बेटी सुशीला (Sushila) के लिए बेहद दुखदायी साबित होता है।

सुशीला का विवहा कौण्डिन्य से होने के बाद वह दोनों अपना घर छोड़ के जाने का फैसला लेते है ताकि कर्कश द्वारा उत्पीड़न से बचा जा सके। अपने सफर के दौरान कौण्डिन्य तालाब के पास स्नान हेतु रुक जाते है वही सुशीला वहा बैठी औरतो के पास चली जाती है जो की पूजा पाठ कर रही होती है। सुशीला उन औरतो से पूछती है की यह किस प्रकार की पूजा है तो वह औरते बताती है की यह अनंत की पूजा है।

वहा बैठी औरतो ने सुशीला को इस पूजा की महत्वता समझाते हुए बताया की यह अनंत के लिए व्रत है जिसमे 14 पूरी (आटे से बनी) और 14 पूए बनाये जाते है जिसमे से आधा ब्राह्मण को दिया जाता है।

इस व्रत में घास से एक साँप (कोबरा) बनाया जाता है और बांस की बनी टोकरी में रखा जाता है और सुंगंधित फूल, तेल का दिया अगरबत्ती से साँप की पूजा की जाती है और भोग लगाया जाता है।

एक रेशमी धागे पर जिसपर सिन्दूर लगा हो उसपे 14 गांठे बांध कर भागवान के आगे रखी जाती है और फिर आदमी उस धागे को अपने सीधे हाथ की बाजू पर और औरते अपने उलटे हाथ की बाजू पर बांधती है।  इसे 14 वर्षो तक नहीं तो 14 दिनों तक बाजु पर बांधने के उपरांत पीपल के वृष पर चढ़ाये।

यह व्रत हर उस इंसान को करना चाहिए जो अच्छी बुद्धि धन दौलत से समृद्ध होना चाहते है।

यह सुनकर सुशीला भी वह व्रत रखती है और अपनी बायीं बाजू पर धागा बांध लेती है और देखते ही देखते उनके जीवन में धन दौलत की वर्षा होने लगती है। एक दिन कौण्डिन्य को इसके बारे में पता चलता है और सुशीला से कहता है की यह समृद्धि किसी व्रत या धागे से नहीं उसकी सूझ बूझ परिश्रम से आयी है और वह धागा उतार कर आग में जला देता है।


 

कौण्डिन्य के ऐसा करने से उनके जीवन में गरीबी के हालात गए और जीवन में कठिनाइया आने लगी। कौण्डिन्य समझ चुके थे की उनको अपनी गलती की सजा मिल रही है। कौण्डिन्य प्रण लेते है की वह कठोर तपस्या करेंगे जबतक भगवान् उन्हें दर्शन ना दे और माफ़ी ना दे।

कौण्डिन्य जंगल में जाते है और वहाँ एक आम के पेड़ को देखते है परन्तु उस पेड़ पर लगे आम कोई नहीं खा रहा था। पूरे पेड़ पर कीड़े लगे हुए थे। कौण्डिन्य ने पेड़ से पुछा यदि उसने अनंत को देखा हो परन्तु सफलता हासिल नहीं हुई। फिर कौण्डिन्य ने एक गाये देखि जो की अपने बछड़े के साथ खड़ी थी और बैल घास पर खड़े थे परन्तु वह घास नहीं खा रहे थे। फिर कौण्डिन्य ने दो झीलों को देखा जो की मिल रही थी। फिर एक गधे और हाथी को देखा और इन सब से पुछा अनंत के बारे में परन्तु सबने कहा उन्होंने अनंत का नाम नहीं सुना। कौण्डिन्य बेक़रार होक एक फ़ासी का फंदा बना लेता है।

उसी पल एक ब्राह्मण आये और उन्होंने कौण्डिन्य का फंदा हटाया और उन्हें एक गुफा में ले गए जहा उन्हें शुरू में तो बहुत अँधेरा दिखा और उसके बाद एक बहुत बड़ी सी रोशन जगह मिली और वह ब्राह्मण सीधा चलते हुए अपने सिंहासन पर बैठ गए।

कौण्डिन्य अब उस ब्राह्मण को नहीं देख पा रहे थे परन्तु वहा केवल भगवन विष्णु उपस्थित थे। कौण्डिन्य

को अहसास हुआ की उसे बचाने के लिए स्वयं विष्णु भगवान् आये थे और वही है अनंत।

कौण्डिन्य भगवान को अपने पाप के बारे में बताते है की उसने कैसे सुशीला की बाजू से धागा उतार फैका। भगवन विष्णु से अनंत से कहा यदि तुम 14 वर्षो तक यह धागा अपनी बाजू पर बांधते हो तो तुम्हारी दरिद्रता दूर होगी और तुम्हे धन, संतान बुद्धि की प्राप्ति होगी।